बिहार से पलायन कोई नई बात नहीं है और न ही पलायान पर ये कोई पहला लेख है. बिहार से पलायन सदियों से हो रही है. दुनिया के कई देश माइग्रेटेड बिहारियों से आबाद है. ऐसे में आप कह सकते हैं कि पंजाबियों के पलायन को पॉजिटिव और बिहारियों के पलायान को निगेटिव क्यों लिया जाता है. बिहार से बाहर बिहारी को महामारी तरह लिया जाता है जबकि पंजाबियों, गुजरातियों और मारवाड़ियों के साथ ऐसा नहीं होता. आखिर इसकी कुछ तो वजह रही होगी कि बिहार से बाहर कोई बिहरी कहलाना कोई पसंद नहीं करता?
देश में बिहारियों का पलायन ही मुद्दा क्यों बनाया जाता है? ये भी एक सच्चाई है कि दूसरे प्रदेशों के लोग भी बेहतरी के लिए पलायन करते हैं जबकि बिहार से ज्यादातर पलायन दू जून की रोटी के लिए होता है. इसमें मजदूर से लेकर प्रोफेशनल्स तक शामिल है. इस वजह से बिहार में क्वालिटेटिव पीपल की घोर आभाव है. जो भी छोटी-बड़ी कंपनिया बिहार में आना चाहती है उसे न तो ढंग के मजदूर मिलते हैं और ना ही प्रोफेशनल्स. अधकचरा टाइप के लोग भरे पड़े हैं. रॉ मेटेरियल को शेप-अप तो कर सकते हैं मगर कूड़ा को डंप करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता. यानी बिहार में पैसा लगाने से पहले हजार बार सोचना पड़ता है. कंजूमर स्टेट के तौर पर स्वीकार्यता तो है मगर प्रोडक्टिव स्टेट के तौर एसेप्टेंसी नहीं है. अगर कोई कंपनी बिहार में इंट्रेस्ट दिखाती है तो सर्वे में ही फेल हो जाता है. किसी भी कंपनी के सुरक्षा के बाद ह्यूमन रिसोर्स ज्यादा मायने रखता है. जब प्रोफेशनल्स ही नहीं मिलेंगे तो कोई कंपनी सिर्फ इमोशनल होकर अपना करोड़ों रुपये दांव पर क्यों लगाएगी?
कई इमोशनल बिहारियों को लगता है कि मीडिया में उसे बदनाम किया जाता, इस वजह से बिहार का इमेज खराब हो जाता है जिसकी वजह से इनवेस्टमेंट नहीं हो रहा है. हाल ही बिहार के मुख्यमंत्री ने एक कार्यक्रम में बड़ा जो देकर कहा कि पलायन को पॉजिटिव लिया जाए. मगर सवाल उठता है कि पलायन को पॉजिटिव कैसे लिया जाए? जब 100 रूपये कि दिहाड़ी के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर जाना पड़े तो पलायन को पॉजिटिव कैसे लिया जाए? धान काटने के लिए जो दूसरे प्रदेशों में जाते हैं उनसे पूछिए वो बेहतर बताएंगे. उनकी मजबूरी महज पेट पालने की होती है. इसका मतलब ये हुआ कि बिहार में आप मेहनत करके पेट भी नहीं पाल सकते है. दूसरे जगह कम से कम भर पेट भोजन का तो इंतजाम हो ही जाएगा. शायद यही वजह है कि बिहार से बिहारियों की पलायन मजबूरी हो गई है. जबकि सरकार सीना ठोककर कह रही है कि पलायन मजबूरी नहीं है. यानी सरकार और आमलोगों के नजरिए में बहुत फर्क है. ये फर्क बताता है कि सरकार की मंशा क्या है?
एक ये भी सच्चाई है कि 12वीं के बाद बिहार में वही बच्चे रह जाते हैं जिनके माता-पिता की क्षमता बिहार से बाहर पढ़ाई के लिए भेजने की नहीं होती है. अगर ऐसा नहीं है तो सरकार को एक सर्वे करा लेनी चाहिए. बिहार में बच्चा पैदा करनेवाले अस्पताल और 12वीं तक के स्कूल के अलावा शायद ही कोई चीज बचा है. जो बचा है वो नाकाफी है. बिहारियों की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता. आप उस पर भरोसा नहीं कर सकते. इसका मतलब ये हुआ कि सिस्टम और सरकार फेल है. एक बार जो बिहार से बाहर निकल जाता है वो सिर्फ शादी-विवाह या फिर दिवाली छठ में ही लौटता है. 2 सप्ताह गुजारने के बाद वो अपने रोजी-रोटी वाले शहर को मिस करने लगता है. ऐसी भी बात नहीं है कि इसका दोष सिर्फ मौजूदा सरकार की है. आज से 27 पहले जो सिलसिला शुरू हुआ उसमें अब बहुत तेजी आ गई है. मगर वर्तमान सरकार अब दर्द को ही दवा बनाना चाहती है. तभी तो पलायन में पॉजिटिविटी खोज रही है.
देश में बिहारियों का पलायन ही मुद्दा क्यों बनाया जाता है? ये भी एक सच्चाई है कि दूसरे प्रदेशों के लोग भी बेहतरी के लिए पलायन करते हैं जबकि बिहार से ज्यादातर पलायन दू जून की रोटी के लिए होता है. इसमें मजदूर से लेकर प्रोफेशनल्स तक शामिल है. इस वजह से बिहार में क्वालिटेटिव पीपल की घोर आभाव है. जो भी छोटी-बड़ी कंपनिया बिहार में आना चाहती है उसे न तो ढंग के मजदूर मिलते हैं और ना ही प्रोफेशनल्स. अधकचरा टाइप के लोग भरे पड़े हैं. रॉ मेटेरियल को शेप-अप तो कर सकते हैं मगर कूड़ा को डंप करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता. यानी बिहार में पैसा लगाने से पहले हजार बार सोचना पड़ता है. कंजूमर स्टेट के तौर पर स्वीकार्यता तो है मगर प्रोडक्टिव स्टेट के तौर एसेप्टेंसी नहीं है. अगर कोई कंपनी बिहार में इंट्रेस्ट दिखाती है तो सर्वे में ही फेल हो जाता है. किसी भी कंपनी के सुरक्षा के बाद ह्यूमन रिसोर्स ज्यादा मायने रखता है. जब प्रोफेशनल्स ही नहीं मिलेंगे तो कोई कंपनी सिर्फ इमोशनल होकर अपना करोड़ों रुपये दांव पर क्यों लगाएगी?
कई इमोशनल बिहारियों को लगता है कि मीडिया में उसे बदनाम किया जाता, इस वजह से बिहार का इमेज खराब हो जाता है जिसकी वजह से इनवेस्टमेंट नहीं हो रहा है. हाल ही बिहार के मुख्यमंत्री ने एक कार्यक्रम में बड़ा जो देकर कहा कि पलायन को पॉजिटिव लिया जाए. मगर सवाल उठता है कि पलायन को पॉजिटिव कैसे लिया जाए? जब 100 रूपये कि दिहाड़ी के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर जाना पड़े तो पलायन को पॉजिटिव कैसे लिया जाए? धान काटने के लिए जो दूसरे प्रदेशों में जाते हैं उनसे पूछिए वो बेहतर बताएंगे. उनकी मजबूरी महज पेट पालने की होती है. इसका मतलब ये हुआ कि बिहार में आप मेहनत करके पेट भी नहीं पाल सकते है. दूसरे जगह कम से कम भर पेट भोजन का तो इंतजाम हो ही जाएगा. शायद यही वजह है कि बिहार से बिहारियों की पलायन मजबूरी हो गई है. जबकि सरकार सीना ठोककर कह रही है कि पलायन मजबूरी नहीं है. यानी सरकार और आमलोगों के नजरिए में बहुत फर्क है. ये फर्क बताता है कि सरकार की मंशा क्या है?
एक ये भी सच्चाई है कि 12वीं के बाद बिहार में वही बच्चे रह जाते हैं जिनके माता-पिता की क्षमता बिहार से बाहर पढ़ाई के लिए भेजने की नहीं होती है. अगर ऐसा नहीं है तो सरकार को एक सर्वे करा लेनी चाहिए. बिहार में बच्चा पैदा करनेवाले अस्पताल और 12वीं तक के स्कूल के अलावा शायद ही कोई चीज बचा है. जो बचा है वो नाकाफी है. बिहारियों की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता. आप उस पर भरोसा नहीं कर सकते. इसका मतलब ये हुआ कि सिस्टम और सरकार फेल है. एक बार जो बिहार से बाहर निकल जाता है वो सिर्फ शादी-विवाह या फिर दिवाली छठ में ही लौटता है. 2 सप्ताह गुजारने के बाद वो अपने रोजी-रोटी वाले शहर को मिस करने लगता है. ऐसी भी बात नहीं है कि इसका दोष सिर्फ मौजूदा सरकार की है. आज से 27 पहले जो सिलसिला शुरू हुआ उसमें अब बहुत तेजी आ गई है. मगर वर्तमान सरकार अब दर्द को ही दवा बनाना चाहती है. तभी तो पलायन में पॉजिटिविटी खोज रही है.