शनिवार, 8 सितंबर 2018

ऐसा कोई सगा नहीं, जिसने सवर्णों को ठगा नहीं...


भारत किसका है...और भारत के कौन हैं। ये सवाल इसीलिए क्योंकि...2 अप्रैल के भारत बंद में किसका 'भारत' बंद हुआ था....और 6 सितंबर के भारत बंद में किसका 'भारत' बंद हुआ। आखिर 2 अप्रैल और 6 सितंबर के भारत बंद में क्या अलग-अलग भारत के लोग थे...या फिर एक ही भारत के लोग थे।

यकीनन दोनों एक ही भारत के लोग हैं....लेकिन सियासत और सियासदानों ने वोटबैंक के लिए इनके दो टुकड़े कर दिए हैं...जिसका नतीजा है 2 अप्रैल का भारत बंद और 6 सितंबर का भारत बंद। कभी दलितों का हितैषी..तो कभी सवर्णों का हितैषी बनने का दावा करने वाले ये नेता इनकी हालत में सुधार लाने के सवाल पर खामोश हो जाते हैं। अब देखिए सवर्णों के सबसे बड़े हितैषी बनने का दंभ भरने वाली बीजेपी से ही सवर्ण सवाल पूछ रहे हैं और बीजेपी खामोश है। खामोश वो पार्टियां भी हैं और वो नेता भी हैं..जो सवर्ण के हितैषी होने का दंभ भरा करते थे। आखिर सवर्णों के भारत बंद का ना खुलकर समर्थन..ना विरोध करने की हिम्मत क्यों नहीं हैं सियासी पार्टियों में। आखिर सवर्ण पर सियासत और सियासतदां इतने कन्फ्यूज क्यों हैं?

हालांकि एससी-एसटी एक्ट को लेकर सवर्णों में बीजेपी के प्रति जो गुस्सा है उसे भुनाने के लिए कांग्रेस ने पार्टी ने गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण देने की मांग की है। सवर्ण आरक्षण को कांग्रेस के समर्थन से संबंधित एक खबर को पार्टी के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी री-ट्वीट करते हैं और उसके बाद बिहार कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अनिल शर्मा एलान करते हैं कि उनकी पार्टी उच्च जातियों के गरीबों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग करती है। हालांकि चुनाव को देखते हुए सवर्णों के लिए कांग्रेस का ये लॉलीपॉप पुराना है। हालांकि सवर्णों को लुभाने के लिए इस तरह के लॉलीपॉप थमाने की कोशिश चुनाव के वक्त लगभग सभी पार्टियां करती हैं। इसे समझने के लिए सवर्णों के लिए किए चंद लुभावने वादों और वादों पर कितना अमल हुआ, इसे सिलसिलेवार ढंग से याद कीजिए:-

1991 में मंडल कमीशन रिपोर्ट लागू होने के ठीक बाद पीएम पीवी नरसिंह राव ने भी गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया था लेकिन 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए खारिज कर दिया।

2000 में भी लालू ने गरीब सवर्णों के लिए 5% आरक्षण का राग छेड़ा था।

बीजेपी ने अपने वोट बैंक को खुश करने के लिए 2003 में एक मंत्री समूह का गठन किया लेकिन कोई प्रगति नहीं हो सकी और बीजेपी 2004 का चुनाव हार गई।

फिर 2006 में कांग्रेस ने भी ऐसी ही कमेटी बनाई जिसे आर्थिक रूप से पिछड़े उन वर्गों को अध्ययन करना था जो मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के दायरे में नहीं आते हैं. लेकिन इस पर भी कोई प्रगति नहीं हुई।

2010 चुनाव से पहले एक बार फिर लालू ने गरीब सवर्णों को 10% आरक्षण देने का राग छेड़ा था।

फिर 2011 में सवर्णों को लुभाने और आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों की स्थिता का अध्ययन करने के लिए नीतीश
ने सवर्ण आयोग का गठन किया, लेकिन सवर्ण आयोग की रिपोर्ट पर अब तक अमल नहीं हुई।

2015 विधानसभा चुनाव के वक्त भी लालू-नीतीश ने गरीब सवर्णों को आरक्षण और सवर्ण आयोग की रिपोर्ट लागू करने का वादा किया था। लेकिन चुनाव जीतने के बाद भी लालू-नीतीश ने पहल नहीं की।

इन दिनों ने एलजेपी प्रमुख रामविलास पासवान ने भी गरीब सवर्णों को 15% आरक्षण देने का राग छेड़ा है।

इसके अलावा नीतीश सरकार ने कई ऐसे फैसले लिए, जिसमें गरीब सवर्ण छात्रों की उपेक्षा की गई। मसलन बिहार में आउटसोर्सिंग में आरक्षण देने के वक्त भी गरीब सवर्णों की याद नहीं आई। सिविल सेवा परीक्षा प्रोत्साहन योजना लागू करते वक्त भी गरीब सवर्णों की याद नहीं आई, जिसके तहत यूपीएससी और बीपीएससी के पीटी और मेन्स परीक्षा पास करने पर प्रोत्साहन राशि दी जाती है। इसमें पहले SC-ST फिर OBC छात्रों को शामिल किया गया, लेकिन गरीब सवर्णों को भुला दिया गया।

एक बार फिर लोकसभा चुनाव नजदीक देखते हुए और सवर्णों के गुस्से को भांपते हुए बीजेपी, कांग्रेस समेत सभी पार्टियों ने गरीब सवर्णों को आरक्षण देने का जुमला गढ़ना शुरु कर दिया है। लेकिन ये सिर्फ छलावा है। क्योंकि अगर बीजेपी और एलजेपी को गरीब सवर्णों को आरक्षण देना है, तो फिर सत्ता में होते हुए भी उसे किसने रोका है। विशेष संसद सत्र बुलाकर संविधान संशोधन या अध्यादेश लाकर कोरी बयानबाजी के बजाए क्यों नहीं इस बारे में पहल की जा रही है? वहीं सवाल कांग्रेस से भी कि आखिर दस सालों तक यूपीए सरकार के दौरान गरीब सवर्णों को आरक्षण देने के बारे में ठोस पहल क्यों नहीं की गई?

ज़ाहिर है सवर्णों को सबने ठगा है और एक बार फिर ठगने की कोशिश की जा रही है। सवर्णों से ये छलावा तब है, जब बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से 15 लोकसभा सांसद सवर्ण जातियों के हैं। 2015 में कुल 243 विधानसभा सीटों में से 51 सीटों पर अगड़े वर्ग के प्रत्याशी जीते। 2014 के लोकसभा चुनावों तक सवर्ण बीजेपी के साथ मजबूती से खड़ा रहा। लेकिन आज वही सवर्ण बीजेपी से सवाल पूछने के लिए सड़कों पर उतरा, तो कोई नेता साथ देना तो छोड़िए...जवाब देने के लिए सामने नहीं आए। तो सवाल है कि क्या नेताओं ने मान लिया है कि सवर्णों के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है। क्या मान लिया है कि सवर्ण समाज के लोग शांत स्वभाव के होते हैं, तो कुछ नहीं बोलेंगे। हालांकि सवर्णों के भारत बंद के बाद नेताओं की ये राय बदलनी होगी, बशर्ते कि सवर्ण अपने इस आंदोलन को ठंडा नहीं होने दे।

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